• बजट में स्वास्थ्य के लिए अल्प आबंटन के गंभीर प्रभाव होंगे

    केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट 2023-24 से बहुत उम्मीदें थीं, क्योंकि अगले साल संसद के आगामी चुनाव से पहले यह मौजूदा सरकार का आखिरी बजट था

    Share:

    facebook
    twitter
    google plus

    - डॉ अरुण मित्रा

    बजट में कहीं भी डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ के परिलब्धियों के लिए आबंटन में वृद्धि का संकेत नहीं दिया गया है। अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, आशा, आंगनबाड़ी आदि की सेवाओं को उचित सम्मान नहीं दिया गया है। उन्हें इस बजट में कार्यकर्ता का दर्जा नहीं दिया गया है। पोषण अभियान के लिए आबंटन पिछले साल 3700 करोड़ रुपये से घटाकर 2700 करोड़ रुपये कर दिया गया था। इससे हाशिये के तबकों का पोषण प्रभावित हो रहा है।

    केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट 2023-24 से बहुत उम्मीदें थीं, क्योंकि अगले साल संसद के आगामी चुनाव से पहले यह मौजूदा सरकार का आखिरी बजट था। उम्मीद थी कि स्वास्थ्य सहित विभिन्न क्षेत्रों में आम लोगों के बड़ी राहत मिलेगी। लेकिन बजट में स्वास्थ्य के लिए अल्प आबंटन से लोगों की आकांक्षाओं पर पानी फिर गया है। यह स्पष्ट रूप से इसलिए है क्योंकि हमारे देश में सत्तारूढ़ सरकारों द्वारा स्वास्थ्य और शिक्षा को संसाधन के रूप में नहीं लिया जाता है।

    इस संदर्भ में घोर निराशा की बात यह है कि वित्तमंत्री द्वारा प्रस्तुत बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए आबंटन में कमी की गई है। पिछले साल पेश किये गये बजट में कुल बजट के 39.45 लाख करोड़ रुपयों में से स्वास्थ्य के लिए 86606 करोड़ रुपये आबंटित किये गये थे, जो बजट का 2.19 प्रतिशत है। लेकिन इस साल स्वास्थ्य के लिए कुल 45 लाख करोड़ रुपये के बजट में से 88956 करोड़ रुपये का आबंटन किया गया है, यानी बजट का 1.97 फीसदी। इस अवधि के दौरान उच्च मुद्रास्फीति के बावजूद आबंटन में 0.22 फीसदी की कमी आई है।

    राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के लिए बजटीय आबंटन में केवल 0.21 फीसदी की वृद्धि देखी गई है। राष्ट्रीय एड्स (एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशिएंसी सिंड्रोम) और एसटीडी (यौन संचारित रोग) नियंत्रण कार्यक्रम के लिए बजट में 11.61 प्रतिशत की वृद्धि की गई है - जो 2021-22 के 2349.73 करोड़ जो के संशोधित अनुमान की तुलना में 2,622.75 करोड़ हो गया है। हालांकि, अगर हम इसकी तुलना 2020-21 में राष्ट्रीय एड्स (एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशिएंसी सिंड्रोम) और एसटीडी (यौन संचारित रोग) नियंत्रण कार्यक्रम पर खर्च किये गये वास्तविक धन से करें तो 6.84 प्रतिशत की गिरावट आई है।

    पूरी कवायद ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ के बुनियादी ढांचे और रोजगार के बजाय डिजिटल एजेंडे को बढ़ावा देने की है। यह समझ से परे है कि वास्तविक जमीनी स्तर के बुनियादी ढांचे के विकास के बिना डिजिटलाइजेशन कैसे मदद करने वाला है। डब्ल्यूएचओ ने बार-बार कहा है कि स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए यह जरूरी है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च जीडीपी का 5फीसदी होना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से हमारे देश में कई वर्षों से सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय बहुत कम, 2.1 प्रतिशत से नीचे ही रहा है। ऑक्सफैम की 'असमानता को कम करने की प्रतिबद्धता रिपोर्ट 2020' के अनुसार भारत स्वास्थ्य खर्च में 154वें स्थान पर है, नीचे से 5वें स्थान पर। इसलिए उम्मीद की जा रही थी कि सरकार स्वास्थ्य के प्रति बजटीय आबंटन को लेकर गंभीर होगी। लेकिन यह नहीं होना था।

    'ऑक्सफैम इंडिया की असमानता रिपोर्ट 2021: भारत की असमान स्वास्थ्य सेवा कहानी' आगे बताती है कि भारत में बढ़ती सामाजिक-आर्थिक असमानताएं सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूएचसी) की अनुपस्थिति के कारण हाशिये पर के समूहों के स्वास्थ्य परिणामों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर रही हैं। रिपोर्ट से पता चलता है कि सामान्य वर्ग एससी और एसटी से बेहतर प्रदर्शन करता है; हिंदू मुसलमानों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं; अमीर गरीबों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं; पुरुष महिलाओं से बेहतर हैं; और शहरी आबादी विभिन्न स्वास्थ्य संकेतकों पर ग्रामीण आबादी से बेहतर है।

    बजट में कहीं भी डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ के परिलब्धियों के लिए आबंटन में वृद्धि का संकेत नहीं दिया गया है। अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, आशा, आंगनबाड़ी आदि की सेवाओं को उचित सम्मान नहीं दिया गया है। उन्हें इस बजट में कार्यकर्ता का दर्जा नहीं दिया गया है। पोषण अभियान के लिए आबंटन पिछले साल 3700 करोड़ रुपये से घटाकर 2700 करोड़ रुपये कर दिया गया था। इससे हाशिये के तबकों का पोषण प्रभावित हो रहा है।

    मनरेगा के लिए आबंटन 89,400 करोड़ रुपये से घटाकर 60,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है। इसके अलावा, ग्रामीण विकास आबंटन को संशोधित अनुमान में 2,43,317 करोड़ रुपये से घटाकर कुल बजट व्यय का 2,38,204 करोड़ रुपये कर दिया गया है, जो कुल बजटीय खर्च का 5 फीसदी ही है। यह ग्रामीण क्षेत्र के लिए सरकार की कम प्राथमिकता को दर्शाता है। ग्रामीण क्षेत्र और मनरेगा के लिए खराब आबंटन लोगों की क्रय क्षमता को कम कर देगा जिससे उनका पोषण प्रभावित होगा। अल्पपोषण के साथ लोगों के बीच बेहतर स्वास्थ्य सूचकों की अपेक्षा करना भोलापन होगा।

    नर्सिंग कॉलेज बढ़ाने की बात चल रही है। लेकिन जब तक उनके लिए नौकरी रोजगार के साथ यह नहीं होगा, उन्हें बहुत कम वेतन पर निजी क्षेत्र में काम करने के लिए छोड़ दिया जायेगा या बेहतर अवसरों के लिए दूसरे देशों में पलायन करने को प्रेरित किया जायेगा। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) जो पहले रेफरल केंद्र हैं और माना जाता है कि इसमें एक सर्जन, एक प्रसूति-स्त्री रोग विशेषज्ञ, एक बाल रोग विशेषज्ञ, एक चिकित्सक और एक एनेस्थेटिस्ट होना चाहिए। लेकिन सर्जनों और बाल रोग विशेषज्ञों में 80 फीसदी से अधिक की कमी है, और चिकित्सकों और प्रसूति-स्त्री रोग विशेषज्ञों में 70 फीसदी से अधिक की कमी है। इन रिक्तियों को भरने के लिए कोई योजना या दिशा नहीं है, इसके बावजूद कि हर साल आने वाले डॉक्टरों की संख्या में वृद्धि हुई है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण उनमें से अधिकांश निजी क्षेत्र का विकल्प चुनते हैं या दूसरे देशों में चले जाते हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मोड पर जोर है जिसके माध्यम से सार्वजनिक धन मोटे तौर निजी खिलाड़ियों को दे दिया जायेगा।

    बजटीय आबंटन की पूरी कवायद से देश में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार नहीं होने वाला है और सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल का कोई संकेत नहीं दिखता है। अगर स्वास्थ्य सेवाओं को समाज के सभी वर्गों के लिए समावेशी बनाना है तो बजटीय आबंटन को राजस्व बजट के 10 फीसदी तक बढ़ाने की आवश्यकता है।

    Share:

    facebook
    twitter
    google plus

बड़ी ख़बरें

अपनी राय दें